

सत्येन्द्र बडघरे कवर्धा – कबीरधाम जिले के पिपरिया तहसील अंतर्गत आने वाले ग्राम डेहरी में एक निर्माणधीन आवास के मकान को तहसीलदार पिपरिया के आदेश पर ध्वस्त कर दिया गया ।

दरअसल मामला दो परिवारों के बीच का है बताया जा रहा है लगभग दो पीढ़ी पूर्व दोनों परिवारों के परिजनों ने जमीन की अदला-बदली की थी
वही एक परिवार खेत को अपने नाम पर रजिस्ट्री करवा लिया तो वही दूसरे परिवार जहां उसका मकान था उसकी जमीन को आबादी होने के कारण रजिस्ट्री नहीं करवा पाए लगभग सैकड़ो साल बीतने के बाद तीसरी पीढ़ी ने उक्त जमीन पर अपना हक जताते हुए तहसीलदार पिपरिया को निर्माण अधीन मकान तोड़ने के लिए आवेदन दिया तो वही दूसरा परिवार मकान न टूटे इस कारण एसडीएम न्यायालय में अर्जी लगाई मामले में सुनवाई की अगली तारीख भी मिली है बावजूद इसके तहसीलदार साहब का बुलडोजर चलाना समझ से परे है।
प्रार्थी ने सीधे आरोप लगाते हुए कहा कि राजनीति दबाव और तहसीलदार पिपरिया की मनमानी के चलते आज उनके सर से छत छीन लिया गया है और अब वे सड़क पर रहने को मजबूर है दरअसल यह पूरा मामला पिपरिया तहसील अंतर्गत आने वाले ग्राम डेहरी का है।
प्रार्थी श्रीमती विलासा निषाद पति स्व.रामलाल निषाद व उनके बेटे सुरेश और दिनेश ने बताया कि वह इस जमीन पर तीन पीढ़ी से निवासरत है वही दिनांक 10/ 4./2026 को प्रशासन के द्वारा उनके प्रधानमंत्री आवास योजना का मकान जिसकी एक किस्त की राशि निकाल कर और बाकी पैसे को कर्ज लेकर वह मकान निर्माण कर रहे थे जीसे तहसीलदार साहब के आदेश पर तोड़ा गया है, गरीबी से जूझ रहे परिवार में छोटे-छोटे बच्चे हैं साथ उन्होंने यह भी आरोप लगाते हुए कहा कि पड़ोसी केजा राम साहू का पुत्र मोतीराम साहू राजनीति से जुड़ा हुआ व्यक्ति है और वर्तमान में ग्राम में जनप्रतिनिधि के पद पर कार्यरत है साथ ही उन्होंने आरोप लगाते हुए यह भी कहा कि गरीबों के साथ छलावा हो रहा है और प्रदेश में गरीबों की शुध लेने वाला तक कोई नहीं साथ ही उन्होंने यह भी कहा बार-बार सत्ता के धारी नेताओं के पास उन्होंने अपनी गुहार लगाई बावजूद उनके किसी के भी द्वारा मदद नहीं किया गया , एक तरफ जहां प्रदेश की उत्कृष्ट विधायिका भावना भंवरा लोगों के विकास का ढिंढोरा पीटते नजर आती है तो वही उन्हीं के विधानसभा क्षेत्र में एक परिवार का यौन सड़क पर आ जाना अपने आप में एक बड़ा सवाल खड़ा करता है प्रशासन के और खड़ी की कुछ धारकों की मनमानी के चलते आज पूरा परिवार सड़क पर रहने को मजबूर है।
अब सवाल यह उठता है की अगर ग्राम में प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ सरकार किसी को भी देती है तो उसके द्वारा जमीन का संपूर्ण दस्तावेज सरकारी दफ्तर में जमा किया जाता है उसके बाद ही राशि आहरण होती है परंतु इस मामले में राशि की एक किस्त निकालने के बाद और कर्ज लेकर प्रार्थी ने अपना मकान बनवा रहा था आवास योजना का मकान जानने के बाद भी तहसीलदार और प्रशासनिक अमलों का इस तरीके से मकान को तोड़ देना यह भी एक बड़ा सवाल खड़ा करता है क्या पंचायत के जिम्मेदार अधिकारी व जनप्रतिनिधियों ने अपने आंखों पर काले चश्मे चढ़कर बैठे थे जिस कारण आज एक गरीब परिवार को इतना बड़ा खामीयाजा भुगतना पड़ा , अब देखना यह है कि आगे प्रशासन और शासन किस तरीके से इस परिवार की मदद करता है या फिर इस परिवार को और भी दंश झेलना पड़ेगा।