नेताजी का लगोंटिया होने का दावा करने वाले बड़बोले टीआई साहब को नेजाती ने पटलकर भी नहीं देखा..

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भिलाई: महकमे में एक दूसरे से आए बड़बोले टीआई साहब के पास बोलने के शब्दों की कमी हो गई है, इसलिए मौनी बाबा बनकर बैठे हुए हैं. हुआ यू कि नई सरकार के गठन के बाद बल्क में इंस्पेक्टरों के तबादले हुए. उसमें सूबे के एक बड़े मंत्री जिले से टीआई साहब की जिले में आमद हो गई. तब नेताजी के सुर सांतवें आसमन पर थे. अफसर से लेकर जूनियर सभी पर नेताजी का लंगोटिया होने का रौब जमाते लगे. किसी तरह हाथपैर मारकर एक थाना भी ले लिया. लेकिन थाना ऐसे मिला, जहां सूखा पड़ा था. फिर साहब का गुमान कम नहीं हुआ. जो मिलने आए उसे ही नेताजी के साथ करीबी होने के किस्से सुनाने लगते. एक अरसे तक टीआई साहेब यही कहते रहे कि मेरे नेताजी मुझसे ज्यादा दिनों की दूसरी बर्दस्त नहीं करते. कल ही मुझे अपने पास बुला लेंगे। जब उनके नवरत्नों में शामिल हो जाउंगा तो भौकाल पेलुंगा. शुरुआत में तो सभी साहेब इतना बोल रहे हैं तो कुछ तो सच्चाई होगी. लेकिन दिन गुजरे फिर महीने लेकिन न नेताजी को साहेब की याद और उनका जिले में भी कोई भला हो सका. इस बीच उनकी किरकिस तब हो गई, जब नेताजी का शहर में आगमन हुआ तो सभी लगा कि अब नेताजी पहले अपने चहेते से मिलेंगे फिर कप्तान से गुफ्तगू करेंगे. नेताजी आए साहब उन्हें सलामी ठोकने भी पहुंचे. उन्हें लगा कि कम से कम उनका चेहरा देखकर नेताजी कृष्ण-सुदामा की तरह अपने दरबार से बाहर निकलकर गले लगा लेंगे. लेकिन हुआ इसका उल्टा…नेताजी ने तो साहब को पलटकर भी नहीं देखा!! तब से बेचारे साहब के मुंह से बोल नहीं निकल पा रहा है!

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