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गोविंदा चौहान । मोहला – मानपुर । मानपुर विकासखंड के धुर नक्सल प्रभावित गट्टेगहन गांव में सालभर पहले पीएमजीएसवाय के तहत बना पुल मूसलाधार बारिश से टूटकर जमींदोज हो गया। करोड़ों की लागत से बने पुल के टूटने से महाराष्ट्र के मुहाने पर बसे ग्राम संबलपुर समेत ग्राम बुकामरका व सुड़ियाल का जिला मुख्यालय से संपर्क टूट गया है। वहीं महाराष्ट्र सीमा पर संबलपुर गांव में मौजूद पुलिस कैंप का भी मुख्यालय से संपर्क टूट गया है।
टूट चुके यह पुल निर्माण में हुए भ्रष्टाचार की कहानी खुद बयान कर रहा है। वहीं इसे लेकर निर्माण ठेकेदार व जिम्मेदार विभागीय अफसरों पर अब तक कोई कार्रवाई न होना जिम्मेदार उच्च अधिकारियों की उदासीनता को दर्शा रहा है।

नदी का जलस्तर बढ़ने और पुल टूटने से उक्त तीनों गांव के ग्रामीण आदिवासी, कैंप में तैनात केंद्रीय अर्ध सैनिक बल आईटीबीपी व जिला बल के सुरक्षा जवान चारों ओर से पानी से घिर गए हैं। गांव टापू में तब्दील हो गई है। जरूरतमंद ग्रामीण टूटे हुए पुल अथवा नदी में जान जोखिम में डालकर आवाजाही को मजबूर हो गए हैं।
महाराष्ट्र से नक्सलियों की घुसपैठ रोकने और इलाके में शांति बहाली के लिए संबलपुर गांव में कैंप स्थापित कर नक्सल मोर्चे पर तैनात आईटीबीपी व डीएफ के जवानों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इन जवानों का भी सड़क के जरिए मुख्यालय से संपर्क कट गया है।
कोराचा से पहाड़ के ऊपर मौजूद बुकमरका गांव तक करोड़ों की लागत से सालभर पहले सड़क और पुल निर्माण हुआ था। इलाका नक्सलियों का गढ़ होने और पूर्व में हुई नक्सल वारदातों के मद्देनजर पुलिस जवानों ने बीहड़ों के बीच लालखौफ के साए में अपनी जान हथेली पर रखकर निर्माण को सुरक्षा दी थी, ताकि महाराष्ट्र की सीमा में माओवादियों के गढ़ तक शासन-प्रशासन की पहुंच बन सके। इलाके के आदिवासी बाशिंदे भी सड़क के जरिए शासन-प्रशासन की मुख्य धारा से जुड़ सके।
विडंबना ही कहें कि पुलिस की सुरक्षा में हुए निर्माण में भी निर्माण एजेंसी व प्रशासनिक करिंदों ने जमकर भ्रष्टाचार किया। लिहाजा गुणवत्ताविहीन निर्माण के चलते यह पुल टूटकर जमींदोज हो गया। इसके चलते निर्माण को सुरक्षा देने वाले सुरक्षा जवान ही अपने मुख्यालय से कट गए। वहीं ग्रामीण गांवों में ही कैद होकर रह रहे।
महीनेभर पहले भी टूटा था पुल का बड़ा हिस्सा
यह भी बता दें कि बीते डेढ़ माह के भीतर उक्त पुल दो बार टूट गया है। माहभर पहले ही इसी पुल का एक बड़ा हिस्सा नदी के बहाव को न झेल सका और टूट गया। तब निर्माण एजेंसी ने पुल के टूटे हुए हिस्से में रेत भरी बोरियां डालकर संधारण की खानापूर्ति की थी। बमुश्किल उक्त क्षतिग्रस्त पुल से छोटे वाहनों की आवाजाही हो पा रही थी। अब उक्त पुल दूसरी बार टूट कर पूरी तरह से जमीदोज हो गया। अब वाहन तो दूर पुल पैदल पार करने लायक भी नहीं बचा।
टूट चुके यह पुल निर्माण में हुए भ्रष्टाचार की कहानी खुद बयान कर रहा है। वहीं इसे लेकर निर्माण ठेकेदार व जिम्मेदार विभागीय अफसरों पर अब तक कोई कार्रवाई न होना जिम्मेदार उच्च अधिकारियों की उदासीनता को दर्शा रहा है।