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गोविंदा चौहान । भिलाई: शहर की लाइफ लाइन कही जाने वाले सिटी बसों को लेकर चर्चाओं का बाजार इन दिनों खूब उफान पर है. ये सभी जानते हैं कि कोरोना काल में बसों के पहिया थमके ही कबाड़ में तबदील हो गई थीं. लेकिन उसे आम लोगों के लिए समर्पिक करने की दोबारा कवाद शुरू की गई. बसें भी अपने पैरों पर खड़ी हो गई लेकिन सड़कों तक नहीं पहुंच सकी हैं. अब इसे लेकर निगम में ही अधीनस्थ खूब जुमले बाजी करने में जुटे हैं.दरअसल बसों को जिंदा करने के पीछे एक बड़ा खेल खेले जाने की चर्चा है. निगम के लोगों का कहना है कि जब कोविड काल में खराब हुई तो उसके कल पुर्जे गायब हो गए, जिनका एक-एक पार्ट बसों से भी ज्यादा कीमती था. लेकिन बसों के परिवहन की चौतरफा मांग के चलते साहेब लोगों ने बसों को ऐसे आदमी को देने की प्लानिंग कर डाली, जो बसों को ठीक करके सात साल तक चलाता. इसके बाद बसें परमानेंटली उसकी हो जाती. बस यहीं खेल हो गए. बसें तो ठीक हो गई. दिखाने की सड़कों पर भी आईं लेकिन फिर से गायब हो गईं. अब महकमे में ही चर्चा है कि सात साल की कहानी का फायदा उठाकर बसों को चलाने की जगह तिजोरी में बंद कर दिया है, ताकि बंधन की तय सीमा खत्म होने के बाद बसों पर पूरी तरह अपना अधिपत्य जमा सके. ऐसे बड़े लोगों की तो दोनों तरफ से चांदी रही, इसलिए अधीनस्थ ही बोलने लगे हैं कि जिंदा हाथी लाख का और मरने के बाद सवा लाख का हो गया!