नुआखाई उत्सव: रायपुर में पहली बार निकली शोभायात्रा, जानें इसका इतिहास और महत्व

नुआखाई उत्सव का इतिहास और महत्व

रायपुर । नुआखाई उत्सव सबसे पहले वैदिक काल में शुरू हुआ था, जब ऋषियों ने पंचयज्ञ पर विचार-विमर्श किया था। पंचयज्ञ का एक हिस्सा प्रलम्बन यज्ञ था, जिसमें नई फसलों की कटाई और उन्हें देवी माँ को अर्पित करने का उत्सव मनाया जाता था। तबसे नुआखाई मनाने की परंपरा चली आ रही है। लोग आज अपने घरों में नए फसल का स्वागत करते हैं और नए फसल से पकवान बनाकर पूजा पाठ करते हैं।

नुआखाई की शोभायात्रा रायपुर में

रायपुर में पहली बार नुआखाई की शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें भारी संख्या में लोग शामिल हुए। तेलीबांधा से अंबेडकर चौक तक नुआखाई की शोभायात्रा निकाली गई। नुआखाई गणेश चतुर्थी के एक दिन बाद मनाया जाने वाला यह त्योहार पश्चिमी ओडिशा का सबसे शुभ और महत्वपूर्ण सामाजिक त्योहार है।

नुआखाई का इतिहास

नुआखाई का इतिहास उड़ीसा से जुड़ा हुआ है। कुछ इतिहासकार जनश्रुतियों का उल्लेख करते हुए पश्चिम ओड़िशा में नुआखाई की परम्परा शुरू करने का श्रेय बारहवीं शताब्दी में हुए चौहान वंश के प्रथम राजा रमईदेव को देते हैं। रमईदेव ने लोगों के जीवन में स्थायित्व लाने के लिए उन्हें स्थायी खेती के लिए प्रोत्साहित करने की सोची और इसके लिए धार्मिक विधि-विधान के साथ नुआखाई पर्व मनाने की शुरुआत की। कालान्तर में यह पश्चिम ओड़िशा के लोकजीवन का एक प्रमुख पर्व बन गया।

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