
जांजगीर -चांपा । भारत आज दुनिया की प्रमुख और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। देश की आर्थिक प्रगति में सरकार की नीतियों के साथ-साथ आम नागरिकों की आर्थिक आदतों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे समय में सोने की अनावश्यक खरीद और गैर-जरूरी विदेश यात्राओं को सीमित करना केवल व्यक्तिगत बचत का विषय नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
भारत अपनी सोने की मांग का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। सोने का आयात करने के लिए विदेशी मुद्रा, मुख्यतः डॉलर खर्च करनी पड़ती है। इसी प्रकार विदेश यात्रा के दौरान टिकट, होटल, भोजन, स्थानीय परिवहन और खरीदारी पर किया गया खर्च भी देश से विदेशी मुद्रा के बहिर्वाह का कारण बनता है। इससे देश के आयात बिल और चालू खाते के घाटे पर दबाव बढ़ सकता है। यदि आवश्यकताओं से परे होने वाले इन खर्चों में थोड़ी कमी लाई जाए, तो बची विदेशी मुद्रा का उपयोग ऊर्जा, तकनीक, मशीनरी और आवश्यक कच्चे माल के आयात में किया जा सकता है।
भारत का इतिहास इस विषय में हमें महत्वपूर्ण सीख देता है। वर्ष 1991 में देश गंभीर विदेशी मुद्रा संकट से गुजरा था। स्थिति इतनी चुनौतीपूर्ण हो गई थी कि भारत को विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए अपना सोना तक विदेशों में गिरवी रखना पड़ा। आज देश की आर्थिक स्थिति उस समय जैसी नहीं है, लेकिन 1991 की घटना यह याद दिलाती है कि किसी राष्ट्र के लिए विदेशी मुद्रा का पर्याप्त भंडार कितना महत्वपूर्ण है। वर्ष 2025-26 में भारत का सोना आयात मूल्य लगभग 72 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया।
इसलिए सोना खरीदना या विदेश यात्रा करना गलत नहीं है। आवश्यकता, निवेश और व्यवसाय से जुड़ी यात्राएं अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं। लेकिन यदि मनोरंजन या दिखावे के लिए होने वाले गैर-जरूरी विदेशी खर्च को कुछ समय के लिए कम किया जाए और घरेलू पर्यटन तथा देश में उपलब्ध निवेश विकल्पों को प्राथमिकता दी जाए, तो यह व्यक्तिगत आर्थिक अनुशासन के साथ-साथ राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में भी योगदान बन सकता है।
देश की अर्थव्यवस्था केवल सरकार नहीं बनाती; करोड़ों नागरिकों के छोटे-छोटे आर्थिक निर्णय भी मिलकर उसकी दिशा तय करते हैं।
प्रशांत गुप्ता
तहसीलदार (आर्थिक विश्लेषक)